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सरोजिनी नायडू की जीवनी | Sarojini Naidu Biography in Hindi

सरोजिनी नायडू का जन्म 13 फरवरी, 1879 ई. को हैदराबाद में हुआ। उनके पिता का नाम अघोरनाथ चट्टोपाध्याय और माता वरदा सुन्दरी थी। सरोजिनी को उनसे कविता लेखन की प्रेरणा मिली। 12 वर्ष की उम्र में मैट्रिक की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास करके उन्हें शिक्षा के लिए इंग्लैण्ड भेजा गया। वहाँ पर सरोजिनी के तीन कवाित संग्रह प्रकाशित हुए ‘ द गोल्डेन थ्रेश होल्ड’, ‘द ब्रोकेन विंग’ और ‘द सेप्टर्ड फ्लूट’। इंग्लैण्ड से वापस आने पर सरोजिनी का विवाह गोन्दिराजुल नायडू से हो गया। सरोजिनी नायडू की भेंट गांधी जी से हुई। वह गोपाल कृष्ण गोखले के कार्य से प्रभावित होकर कांग्रेस की प्रवक्ता बन गई। उन्होंने देशभर में घूमकर स्वतन्त्रता का संदेश फैलाया। सरोजिनी नायडू ने हिन्दू-मुस्लिम एकता पर जोर दिया। उन्होंने इंग्लैण्उ अमेरिका आदि देशों का दौरा किया। गांधी ज की दाण्डी यात्रा में वे उनके साथ थीं। उनके भाषण स्वतन्त्रता की चेतना जगाने में जाद का काम करते थे। 1942 ई. में भारत छोड़ो आन्दोलन में उन्होंने भाग लिया। वे कई बार जोल गई। भारत के स्वतन्त्र होने पर वे उत्तर प्रदेश की राज्यपाल बनीं।

सरोजिनी ने नारी मुक्ति और नारी-शिक्षा आन्दोलन शुरू किया। नारी-विकास  को ध्यान में रखकर ही वे अखिल भारतीय महिला परिषद् की सदस्य बनीं। विजय लक्ष्मी पण्डित, कमलादेवी चट्टोपाध्याय, लक्ष्मी मेननी, हंसाबेन मेहता आदि महिलाएँ इस संस्था से जुड़ी थीं।

सरोजिनी नायडू का व्यवहार बहुत सामान्य था। वे युवा वर्ग की सुविधाओं का बहुत ध्यान रखती थीं। वाणी और व्यवहार में सरोजिनी बहुत ही स्नेमयी थीं। प्रकृति से उन्हें विशेष प्रेम था। 2 मार्च सन 1949 ई. को भारत—कोकिला सदा के लिए मौन हो गई। पं. जवाहर लाल नेहरू ने इन शब्दों में सरोजिनी को श्रद्धांजलि दी, ‘उनकी पूरी जिन्दगी एक कविता, एक गीत थी, सुन्दर, मधुर और कल्याणकारी।’

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महर्षि अरविन्द का जीवन परिचय | Sri Aurobindo Biography in Hindi

महर्षि अरविन्द का जन्म 15 अगस्त 1872 ई. को कोलकाता में हुआ इनके पिता डॉक्टर कृष्णधन घोष और माता स्वर्णलता देवी थीं। अरविन्द का सात वर्ष की आयु में शिक्षा के लिए इंग्लैण्ड भेजा गया। उन पर भारतीयों से मिलने पर प्रतिबन्ध था। फिर भी आगे चलकर अरविन्द एक क्रान्तिकारी, स्वतन्त्रता सेनानी, महान भारतीय राजनैतिक, दार्शनिक तथा वैदिक पुस्तकों के व्याख्याता बन गए। सन् 1893 ई. में अरविन्द भारत लौटे। यह वर्ष भारत में नवजागरण की दृष्टि से महत्वपूर्ण था। शिकागो सर्वधर्म सम्मेलन मं विवेकानन्द का उद्घोष, तिलक द्वारा गणपति उत्सव का आरम्भ, ऐनी बेसेण्ट का भारत आना तथा गांधी जी का दक्षिणी अफ्रीका रंगभेद के विरुद्ध संघर्ष ये इस वर्ष की प्रमुख घटनाएँ थीं। इक्कीस वर्ष की आयु में अरविन्द ने देश को स्वतन्त्र कराने और भारतीय संस्कृति की श्रेष्ठता साबित करने का संकल्प लिया। वे बड़ोदरा आकर एक कालेज में प्रधानाचार्य बने। उन्होंने बाद में ‘वंदे मातरम्’ पत्र का सम्पादन भी किया। उन्होंने युवकों को ईमानदारी, अनुशासन, एकता, धैर्य और सहिष्णुता द्वारा निष्ठा विकसित करने को कहा।

सन् 1903 ई. में वे क्रान्तिकारी गतिविधियों में शामिल हो गए। अँग्रेजो ने भयभीत होकर सन् 1908 ई. में उन्हें और उनके भाई को अलीपुर जेल भेजा। यहाँ उन्हें दिव्य अनुभूति हुई जिससे उन्होंने ‘काशकाहिनी’ नामक रचना में व्यक्त किया। जेल से छूटकर अँग्रेजी में ‘कर्मयोगी’ और बांगला भाषा में ‘धर्म’ पत्रिकाओं का सम्पादन किया।

उन्होंने 1912 ई. तक सक्रिय राजनीति में भाग​ लिया। इसके बाद उनकी रुचि गीता, उपनिषद और वेदों में हो गई। भारतीय संस्कृति के बारे में उन्होंने ‘फाउण्डेशन आॅफ इण्डियन कल्चर’ तथा ‘ए डिफेन्स’ की रचना की।

1926 ई. से 1950 तक वे अरविन्द आश्रम में तपस्या और साधना में लीन रहे। यहाँ उन्होंने उनकी अनूठी कृति ‘लाइफ डिवाइन’ दिव्य जीवन प्रकाशित हुई। इसकी गणना विश्व की महान कृतियों में की जाती है। श्री अरविन्द अपने देश और संस्कृति के उत्थान के ​लिए सतत सक्रिय रहे। उनका पाण्डिचेरी स्थित आश्रम आज भी आध्यात्मिक ज्ञान का तीर्थस्थल माना जाता है, जहाँ विश्व के लोग आकर अपनी ज्ञान-पिपासा शान्त करते हैं।

लाला लाजपत राय पर निबंध | Lala Lajpat Ray Essay in Hindi

लाला लाजपत राय का जन्म फिरोजपुर जिले के ढोडिके गाँव में 28 जनवरी सन् 1865 ई. में हुआ। इनके पिता राधाकिशन स्कूल में अध्यापक और माता गुलाबी देवी थी।

लाला लाजपत राय ने अपने पिता से पढ़ने-लिखने का उत्साह पाया। सन् 1882 ई. में जब वे लाहौर कॉनलेज में छात्र थे, आर्य समाज में शामिल हो गए। 23 वर्ष की अवस्था में ये सन् 1888 ई. में कांग्रेस में शामिल हुए और इनहोंने कांग्रेस का ध्यान जनता की की गरीबी और निरक्षरता की ओर दिलाया।

लाला लाजपत राय की आस्था और विश्वास के कारण उन्हें पंजाब केसरी और शेरे पंजाब की उपाधि की गई। ब्रिटिश सरकार की निर्मय आलोचना करने के कारण उन पर राजद्रोह का आरोप लगाया गया। अँग्रेजों ने मई 1907 ई. में लाला जी को गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया। कांग्रेस के भीतर और बाहर उन्हें कांग्रेस का योग्य नेता समझा जाता था। भारत का नेतृत्व करने और समर्थन पाने के लिए वे इंग्लैण्ड और यूरोप कई बार गए।

लाला लाजपत राय ने 30 अक्टूबर, 1928 को लाहौर में साइमन कमीशन का बहिष्कार करने वाली जनता का शान्तिपूर्ण ढंग से नेतृत्व किया। लाठियों के प्रहार के फलस्वरूप लाला जी को गंभीर चोटें आई और 16 नवम्बर, 1929 ई. में रात में दशा खराब होने से प्रात: उनकी मृत्यु हो गई।

लाला जी राजनैतिक गतिविधियों के अलावा सामाजिक सुधार कार्यक्रमों और शिक्षा के प्रसार के लिए भी सक्रिय थे। जनता के उत्थान के लिए वे शिक्षा को अनिवार्य मानते थे। वे ह्रदय से शिक्षा शास्त्री थे। उनका महिलाओं की समस्याओं को देखने का दृष्टिकोण प्रगतिशील था। सन् 1896 ई. में उत्तर भारत में भीषण अकाल के समय जनता को राहत पहुँचाने के कार्य में वे सबसे आगेथे। इसी प्रकार पंजाब में भूकम्प पीड़ितों को राहत पहुँचाने और उनकी सहायता में अग्रणी रहे। राहत कार्य के दौरान इन्होंने ‘सवेंट्स आॅफ पीपुल सोसाइटी’ की स्थापना की। जिसके सदस्य देशभक्त थे और जिसका ध्येय जनसेवा था।

लाला लाजपत राय ने कई पुस्तके लिखीं जैसे – ए हिस्ट्री आॅफ इण्डिया,   महाराज अशोक, वैदिक ट्रैक्ट और अनहैप्पी इण्डिया। इन्होंने कई पत्रिकाओं की स्थापना और सम्पादन भी किया। देशवासियों के लिए उनका योगदाान, त्याग और बलिदान चिरस्मरणीय रहेगा।

स्वामी विवेकानंद की जीवनी | Swami Vivekananda Biography in Hindi

स्वामी विवेकानंद का बचपन का नाम नरेन्द्र था। इनका जनम 12 फरवरी 1863 ई. को कोलकाता में हुआ। इनके पिता का नाम विश्वनाथ दत्त और माता का नाम भुवनेश्वरी देवी था। अधिक प्यार के कारण नरेंद्र, हठी बन गया था। जब वह शरारत करता तो माँ शिव, शिव कहकर उसके सिर पर पानी के छीेंटें देती। इससे ये शान्त हो जाता क्योंकि इनकी शिव में अगाध श्रद्धा थी।

नरेंद्र की आरम्भिक शिक्षा घर पर ही हुई। कुश्ती, बॉक्सिंग, दौड़, घुड़दौड़, और व्यायाम उनके शौक थे। उनके आकर्षक व्यक्तित्व को लोग देखते ही रह जाते। उन्होंने बी.ए. तक शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने पाश्चात्य और भारतीय संस्कृति का विस्तृत अध्ययन किया। दार्शनिक विचारों के अध्ययन से उनके मन में सत्य को जानने की इच्छा जाग्रत हुई। सन् 1881 ई. में उन्होंने रामकृष्ण परमहंस से प्रश्न किया, ‘क्या आपने ईश्वर को देखा है?’ उत्तर मिला, ‘हाँ देखा है, जैसे मैं तुम्हें देख रहा हूँ’ नरेंद्र मौन हो गए। उनका संशय दूर हुआ और उनकी आध्यात्मिक शिक्षा शुरू हो गई। स्वामी रामकृष्ण ने भावी युग प्रवर्तक और संदेश वाहक को पहचान कर टिप्पणी की, ‘नरेन्द्र एक दिन संसार को आमूल झकझोर डालेगा’।

रामकृष्ण की मृत्यु के पश्चात् नरेंद्र ने भारत में घूमकर उनके विचारों का प्रचार करना शुरू कर दिया। उन्होंने तीन वर्ष तक पैदल घूमकर सारे भारत का प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त किया। उन्होंने जीवन का पहला उद्देश्य धर्म की पुनर्स्थापना निर्धारित किया। उनका दूसरा कार्य था – हिन्दू धर्म और संस्कृति पर हिन्दुओं की उत्तराधिकारी बनाना। उन्होंने अपना नाम विवेकानन्द रखा और 1893 ई. के शिकागो धर्म सम्मेलन में भाग लिया। इनकी बोलने की बारी सबसे बाद में आई क्योंकि वहाँ इन्हें कोई नहीं जानता था। इनके सम्बोधन से सभा-भवन तालियों से गूँज उठा और इनहें सर्वश्रेष्ठ व्याख्याता माना गया। इनक विदेशी मित्रों में मार्गरेट नोब्ल सिस्टर निवेदिता और जे.जे. गुडविन सेवियर दम्पत्ति जैसे प्रसिद्ध विद्वान विशेष प्रभावित हुए।

स्वामी जी तीन वर्ष तक इंग्लैण्ड और अमेरिका में रहे। इन्होंने वहाँ पर संयम और त्याग का महत्व समझाया। मानव मात्र के प्रति प्रेम और सहानुभूति उनका स्वभाव था। सेवा के उद्देश्य से उन्होंने 1897 ई. में रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। मिशन का लक्ष्य सर्वधर्म सम्मभाव था। कोलकाता में प्लेग फैलने पर इन्होंने प्लेग ग्रस्त लोगों की सेवा की।

स्वामी जी के ह्रदय मे नारियों के प्रति असीम उदारता का भाव था। वे उन्हें महाकाली की साकार प्रतिमाएँ कहकर सम्मान देते थे। 4 जुलाई 1902 ई. को उनतालीस वर्ष की अल्पायु में उनका देहावसान हो गया। संघर्ष, त्याग और तपस्या का प्रतीक यह महापुरुष भारतीयों के ह्रदयों में चिरस्मरणीय रहेगा।

राजा राममोहन राय पर निबंध | Raja Ram Mohan Essay in Hindi

राजा राममोहन राय का जन्म पश्चिम बंगाल में 11 मई, 1772 ई. को हुूगली जिले के राधानगर गाँव में हुआ। इनक पिता का नाम रमाकांत रय और माता का नाम तारिणी देवी था। इनकी आरम्भिक शिक्षा घर पर बांग्ला भाषा में हुई। पटना से उन्होंने अरबी तथा फारसी की उच्च शिक्षा प्राप्त करके काशी में संस्कृत का अध्ययन किया। उन्होंने अँग्रेजी भी मन लगाकर पढ़ी। वेदान्त और उपनिषदों के प्रभाव से इनका दृष्टिकोण उदारवादी था।

इनहोंने तिब्बत जाकर बौद्ध धर्म का अध्ययन किया। लौटने पर विवाह होने के बाद पारिवारिक निर्वाह के लिए ईस्ट इण्डिया कम्पनी में क्लर्क के पद पर नौकरी कर ली। नौकरी केसमय अँग्रेजी, लैटिन और ग्रीक भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया। 40 वर्ष की उम्र में नौकरी छोड़कर ये कोलकाता मे रहकर समाजसेवा में लग गए। इस दिशा में इन्होंने सती-प्रथा का विरोध, अन्धविश्वासों का विरोध, बहु-विवाह विरोध और जाति प्रथा का विरोध किया। विधवाओं के पुनर्विवाह और पुत्रियों को पिता की सम्पत्ति दिलवाने की दिशा में कार्य किया।

उदारवादी दृष्टिकोण के कारण इन्होंने ‘आत्मीय सभा’ बनाई जिका उद्देश्य ‘ईश्वर एक है’ का प्रचार था। एक ईश्वर की अवधारणा को स्पष्ट करने के लिए ‘ब्रह्रमसभा’ की स्थापना की, जिसका बाद में नाम बदलकर ‘ब्रहसमाज’ रख दिया। इसमें सभी धर्मो की अच्छी बातों का समावेश था। सन् 1821 ई. में ‘संवाद-कौमुदी’ बांग्ला साप्ताहिक पत्र प्रकाशित किया। फिर फारसी में अखबार प्रकाशित किया। वे अँग्रेजी शिक्षा के पक्षघर थे। सन् 1824 ई. में उन्होंने वेदान्त कॉलेज की स्थापना की। जिसमें भारतीय विद्या के अलावा सामाजिक व भौतिक विज्ञान भी पढ़ाई जाती थी।

राजा राममोहन राय ने प्रशासन में सुधार के लिए आन्दोलन किया। ईस्ट इण्डिया कम्पनी के विरुद्ध शिकायत लेकर 8 अप्रैल 1831. को इंग्लैण्ड गए। 27 सितम्बर 1833 ई. में उनकी मृत्यु हो गई।

गुरु तेग बहादुर की जीवनी | Guru Tegh Bahadur Biography in Hindi

गुरु तेग बहादुर के पुत्र तथा उत्तराधिकारी गुरु गोविन्द सिंह का जन्म सन् 1666 ई. में पटना बिहार में हुआ। उन्हें दस वर्षकी अवस्था में गुरु की गद्दी मिली। वे सैनिकों की भाँति घुड़सवारी करते और तलवार चलाते थे। इतना ही नहीं कुछ राजकाज भी होने लगा। इनके शिष्य इन्हें भेंट देते थे। इनके शिष्य तथा दरबारी उन्हें ‘सच्चे बादशाह’ कहते थे। गुरु गोविन्द सिंह सिखों के आग्रह पर आनन्दपुर आ गए तो गुरु तेगबहादुर की राजधानी थी। यहाँ 20 वर्ष तक रहकर धर्मग्रन्थों का अध्ययन किया। ये अच्छे कवि और विचारक थे। इनके द्वारा रचित ‘चंडी-चरित्र’ और  ‘चंडी का वार’ वीररस के सुन्दर काव्य है। इन्होंने एक पुस्तक ‘विचित्र नाटक भी लिखी, जिसके द्वारा लोगों में उत्साह भरने की चेष्टा की।

सन् 1699 ई. में बैसाखी के दिन इन्होंने खालसा पंथ अथवा सिख धर्म की स्थापना की। गुरु गोविन्द सिंह ने सिखों को पाँच वस्तुओं को धारण करना जरूरी बताया। ये वस्तुएँ हैं– केश, कड़ा, कंघा, कच्छा और कृपाण ये ‘पाँच ककार’ कहे जाते हें।

गुरु ने अपने शिष्यों से जाति सूचक शब्द छोड़कर प्रत्येक सिख के नाम के साथ ‘सिंह’ जोड़ना जरूरी समझा। इस प्रकार सिख संगठित सैनिक बन गए। इससे औरंगजेब, जो दक्षिण में था, ने गुरु पर आक्रमण करने का आदेश दिया। गुरु अपपने  दो पुत्र मारे गए और दो को सरहिन्द के सूबेदार ने दीवार चिनवा दिया। गुरु ने फिर भी साहस और धैर्य नहीं छोड़ा। औरंगजेब ने गुरु को कैद करेन का आदेश दिया लेकिन इसी बीच औरंगजेब की मृत्यु हो गई।

गुरु गोविन्द सिंह जी ने अपने 42 वर्ष के अल्प जीवन में अनेक कार्य किए। भेद-भाव मिटाकर और खालसा पंथ को संगठित करके उन्होंने देशवासियों को नई स्फूर्ति और प्रेरणा दी। नि:सन्देह वे हमारे देश के अमूल्य रत्न थे।

शिवाजी महाराज की जीवनी | Chhatrapati Shivaji Maharaj Biography in Hindi

भारतीय इतिहास के महापुरुषों में शिवाजी का नाम प्रमुख है। वे जीवन भर अपने समकालीन शासकों के अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष करते रहे। इनके पिता का नाम शाहजी और माता का नाम जीजाबाई था। शिवाजी बचपन से ही अपनी माता के परम भक्त थे। दादाजी कोणदेव की देख-रेख में शिवाजी कार्यो में शीघ्र ही निपुण हो गए। जब शिवाजी बीस वर्ष के थे, तभी उनके दादा की मृत्यु हो गई। अब शिवाजी ने आस-पास के किलों पर अधिकार करना आरम्भ कर दिया। बीजापुर के सुल्तान उसे उनका संघर्ष हुआ। शिवाजी ने अनेक किलों को जीता और रायगढ़ को अपनी राजधानी बनाया।

शिवाजी की बढ़ती हुई शक्ति से मुगल बादशाह औरंगजेगब को चिन्ता हुई। अब शिवाजी का दमन करने के लिए औरंगजेब ने आमेर के राजा जयसिंह को भेजा। जब जयसिंह के साथ शिवाजी आगरा पहुुँचे, तब नगर के बाहर उनका कोई स्वागत नहीं किया गया। मुगल दरबार में भी उनको यथोचित सम्मान नहीं मिला। स्वाभिमानी शिवाजी यह अपमान सहन न कर सके, वे मुगल सम्राट की अवहेलना करके दरबार से बाहर निकल गए औरंगजेब ने महल के चारों ओर पहरा बैठाकर उनको कैद कर लिया। वह शिवाजी का वध करने की योजना बना रहा था। इसी समय शिवाजी ने बीमार हो जाने की घोषणा कर दी। वे ब्राह्राणों और साधु सन्तो को मिठाइयों की टो​करियाँ भिजवाने लगे। बहँगी में रखी एक ओर की टोकरी में स्वयं बैठकर वे आगरा नगर से बाहर निकल गए।

शिवाजी बहुत प्रतिभावान और सजग राजनीतिज्ञ थे। उन्हें अपने सैनिकों की क्षमता और देश की भौगोलिक स्थिति का पूर्ण ज्ञान था। इसीलिए उन्होंने दुर्गो के निर्माण और छापामार युद्ध नीति को अपने शक्ति संगठन का आधार बनाया। शिवाजी की ओर से औरंगजेब का मन साफ नहीं था। इसलिए सन्धि के दो वर्ष बाद ही फिर संघर्ष आरम्भ हो गया। शिवाजी ने अपने वे सब किले फिर जीत लिए जिनको जयसिंह ने उनसे छीन लिया था।

सन् 1674 ई. में बड़ी धूम-धाम से उनका राज्याभिषेक हुआ। उसी समय उन्होंने छत्रपति की पदवी धारण की। इस अवसर पर उन्होंने बड़ी उदारता से दीन-दुखियों को दान दिया।

बीजापुर और कनार्टक पर आक्रमण करके समुद्र तट के सारे प्रदेश को अपने अधिकार में कर लिया। शिवाजी ने एक स्वतन्त्र राज्य की स्थापना का महान संकल्प किया था और इसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए वे आजीवन संघर्ष करते रहे। शिवाजी सच्चे अर्थो में एक महान राष्ट्रनिर्माता थे। उन्हीं के पदचिह्न्हों पर चलकर पेशवाओं ने भारत में मराठा शक्ति और प्रभाव का विस्तार कर शिवाजी के स्वप्न को साकार किया।