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चंद्रशेखर आज़ाद का जीवन परिचय | Chandra Shekhar Azad Biography in Hindi

अमर शहीद चंद्रशेखर आज़ाद का जन्म 23 जुलाई, 1906 ई. को अलीराजपुर जिले (मध्य प्रदेश) के भावरा गाँव में हुआ था। इनके पिता पं. सीतारामइ तिवारी मूलरूप से उन्नाव जिले (उ. प्र.) के बदरका गाँव के रहने वाले थे। इनकी माता का नाम जगरानी काशी चले गए। चंन्द्रशेखर अब बनारस में संस्कृत शिक्षा पर रहे थे उसी समय वैशाखी के दिन 13 अप्रैल, सन् 1919 को रॉवल एक्ट के विरोध में अमृतसर के जालियाँवाला बाग एक सभा हो रही थी। इस सभा में बच्चे, बूढ़े तथा युवक सभी शामिल थे। सभा के दौरान जनरल डायर ने निहत्थे लोगों पर गोली चलाने का आदेश दे दिया। जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए। रॉयल एक्ट द्वारा क्रांन्तिकारियों के दमन हेतु कठोर कानून बनाया गया था। जालियाँवाला बाग एक सभा हो रही थी। इस सभा में बच्चे, बूढ़े तथा युवक सभी शामिल थे। सभा के दौरान जनरल डायर ने निहत्थे लोगों पर गोली चलाने का आदेश दे दिया। जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए। रॉयल एक्ट द्वारा क्रांन्तिकारियों के दमन हेतु कठोर कानून बनाया गया था। जालियाँवाला बाग वाली घटना की जानकारी चंन्द्रशेखर को समाचार-पत्रों से हुई। अंग्रेजी शासन के इस अल्लर के विरुद्ध किशोर चंन्द्रशेखर को समाचार-पत्रों से हुई। अंग्रेजी शासन के इस अल्लर के विरूद्ध किशोर चंन्द्रशेखर का खून खौल उठा। इन्होंने अंग्रेजों द्वाररा अपने देशवासियों पर किए जा रहे अत्याचारों का बदला लेने की मन में ठान ली। सन् 1921 में गांधी जी के इसहयोग आंन्दोलन के कारण पूरे देश में अंग्रेजी शान का विरोध शुरू हो गया था। लोग विदेशी ​वस्तुओं का बहिष्कार कर उन्हें जला रहे थे। इस स्वदेशी आंन्दोलन के प्रभाव से चंन्द्रशेखर भी अछूते न रहे और आन्दोलन में शामिल हो गए। जहाँ जुलूस व हड़तालें होतीं, चंन्द्रशेखर वहाँ तत्काल पहुँच जाते। उस समय चंन्द्रशेखर की उम्र 16 वर्ष थी।

उसी समय बनारस के एक जुलूस का नेतृत्व करते समय चंद्रशेखर आज़ाद को अंग्रेज पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। अगले दिन चंद्रशेखर को मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया। वहाँ मजिस्ट्रेट ने पूछा कि तुम्हारा नाम क्या है? उन्होंने जवाब दिया–आजाद। फिर मजिस्ट्रेट ने पूछा तुम्हारे पिता का नाम क्या है? जबाव था स्वतंत्रता। उसने चंद्रशेखर को 15 बातों की कठोर सजा सुनाई। इन्होंने हँसते-हँसते व भारत माता की जय बोलते हुए पंन्द्रह बातों की कइोर सजा झेली। इस घटना के बाद चंद्रशेखर आजाद क्रान्तिकारी बन गए। इनके विचरों एवं निडरता की ख्याति चारों तरफ फैल गई। कावेरी रेलवे स्टेशन के पास 9 अगस्त 1925 को सरकारी खजने का लुटने की घटना में आजाद की महत्वपूर्ण भूमिका रही। इनके अधिकांश साथी पकड़े गए। कुछ को फाँसी हुई, लेकिन आजाद, आजाद रहे। साइमन कमीशन के विरोध में सन् 1928 में हुए पदर्शन में पुलिस की मार से लाला लाजपत राय की मृत्यु हो गई। इनकी मृत्यु का बदला लेने के लिए आजाद, भगत सिंह, तथा राजगुरु ने ​पुलिस अधिकारी सांडर्स की हत्या कर दी। उन्हें अंग्रेज पुलिस कभी पकड़ न सकीं। 27 फरवरी, सन् 1931 को आजाद अल्फ्रेड पार्क, इलाहाबाद में अपने क्रान्तिकारी साथियों के साथ मंत्रणा कर रहे थे तभी किसी गद्दार ने उनके वहाँ होने की सूचना अंग्रेजी शासन को दे दी। पूरा पार्क पुलिस द्वारा घेर लिया गया। चारों तरफ गोलिया चल रही थीं। आजाद भी जवाब में गोली दाग रहे थे। उन्होंने अपने साथियों को सुरक्षित बाहर निकाल दिया तथा अकेले मोर्चे पर डठे रहे। जब आजाद के पास एक गोली बची तो उन्होने स्वयं ही अपनी कनपटी पर मार ली। घेरों पुलिस उनके खौफ से उनके पास नहीं आई। आजाद ने पहले ही प्रतिज्ञा की थी कि कभी भी वे जीवित शासन के हाथ नहीं आएँगे। उन्होंने अपनी प्रतिज्ञा पूरी की।

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चौधरी चरण सिंह का जीवन परिचय | Charan Singh Biography in Hindi

चौधरी चरण सिंह का जन्म 23 दिसम्बर, 1902 ई. को उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में स्थित नूरपुर ग्राम में हुआ था। इनके पिता चौधरी मीर सिंह एक साधारण किसान थे। इनकी माँ का नाम नेत्र कौर था। चौधरी चरण सिंह ने आगरा कॉलेज से एल.एल.बी. पास करके गाजियाबाद दीवानी अदालत में वकालत शुरू कर दी। अंग्रेजों के विरुद्ध स्वतन्त्रता संग्राम में इन्होंने बढ़-चढ़कर योगदान दिया।

सन् 1930 में लोनी ग्राम में नमक बनाकर नमक कानून तोड़ने के दण्डस्वरूप पहली जेल यात्रा की। भारत छोड़ो आन्दोलन के समय में सन् 1942 ई. इन्होंने भूमिगत रहकर गाजियाबाद, हापुड़, सरधना, बुलन्दशहर आदि के आसपास एक क्रान्तिकारी गुप्त संगठन बनाया और विदेशी शासन ठप्प करने की मुहिम चलाई।

15 अगस्त, 19457 ई. को भारत स्वतन्त्र होेने पर उत्तर प्रदेश मन्त्रिमण्डल मेंस्वायत शासन और स्वास्थ्य विभाग में इन्हें सभा सचिव का पद मिला। उन्होेंने जमींदारी लेखपालों की नियुक्ति की। कृषि और किसानों के हित में सनप् 1958 ई. में लागू चकबन्दी अधिनियम भी चौधरी चरण सिंह का क्रान्तिकारी कदम था। इसी वर्ष उत्तर प्रदेश में भूमि संरक्षण कानून भी पारित कराया। इन्होने कृषि आपूर्ति संस्थानों की योजना चलाई, जिससे किसानों को सस्ती खाद, बीज आदि की सुविधा प्राप्त हुई।

सन्  1967 ई. में काँग्रेस छोड़कर, 3 अप्रैल को पहली बार वे उत्तर प्रदेश के मुख्यमन्त्री बने। सन् 1970 ई. में वे दोबारा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंन्त्री बने। सन् 1977  के आम चुनाव के बाद जनता पार्टी सरकार में वे पहले गृहंमत्री, बाद में 1979 में उपप्रधानमंत्री तथा वित्त मंत्री बने।

माननीय मोराजी देसाई के त्यागपत्र के बाद 28 जुलाई, 1979 को चौधरी चरण सिंह ने देश के प्रधानमंत्री का पद सम्भाला। उन्होंने गरीबी मिटाने और नागरिकों की मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने का संदेश दिया। 15 अगस्त, 1979 को लाल किले की प्राचीर से उन्होंने देशवासियों को सम्बोधित करते हुए संदेश दिया, ‘राष्ट्र तभी सम्पन्न हो सकता है जब उसके ग्रामीण क्षेत्र का उन्नयन किया गया हो, तथा ग्रामीण लोगों की क्रय शक्ति अधिक हो।’

चौधरी चरण सिंह जातिवाद के घोर विरोधी थे। ईमानदार नेता के रूप में चौधरी ​चरण सिंह का जीवन खुली किताब था जिन पर कोई दोष नहीं था। उन्होंने जीवन के किसी भी क्षेत्र में भ्रष्टाचार को सहन नहीं किया। 29 मई सन् 1987 ई. को किसानों के इस सर्वप्रिय नेता का निधन हो गया।

खान अब्दुल गफ्फार खान की जीवनी | Khan Abdul Ghaffar Khan Biography in Hindi

खान अब्दुल गफ्फार खान को बादशाह खान के नाम से जाना जाता है। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा स्थानी मदरसे (पेशावर) में हुई। इन्होंने थोड़े समय में ही पूरा कुरान याद कर लिया और हाफिजे कुरान बन गए। मदरसे की शिक्षा के बाद वे पेशावर में म्यूनिसिपल बोर्ड हाईस्कूल में भर्ती हुए। फिर वे एडवर्ड्स मेमोरियल मिशन हाईस्कूल में गए। युवा होने पर ये बलिष्ठ और छह फीट तीन इंच लम्बे थे। प्रतिष्ठित परिवार के सदस्य होने के नाते इन्हें ब्रिटिश भारतीय सेना में चुन लिया गया लेकिन थोड़े दिन का अखबार ‘अल हिला’ पढ़ा, इससे उनमें देशप्रेम की भावना और सुदृढ़ हो गई।

क्रान्तिकारी गतिविधियों में सन्देह होने पर इन्हें पेशावर में कैद कर लिया गया। माँ की मृत्यु होने पर ये जेल से छूटकर सीधे अपने गाँव आए, जहाँ लोगों की बड़ी जनसभा में इन्हें ‘पाठकों का गौरव’ की उपाधि दी गई। मई 1928 ई. में इन्होंने पश्तो भाषा का अखबार निकाला। सन् 1928 ई. में वे लखनऊ आए और गांधी जी और नेहरू जी से मिले। इन्हें विश्वास हो गया कि अहिंसा और एकता से विजय प्राप्त की जा सकती है। सन् 1929ई. में इन्होंने एक संगठन ‘खुदाई खिदमतगार’ बनाया। इस आन्दोलन के सदस्य लाल कुर्ती वाले कहलाए। 13 मई, 1930 ई. को सेना की एक टुकड़ी ने लाल कपड़े उतारने को कहा जो उन्होंने नहींं माना। सन् 1931 ई. में उन्हें फिर कैद किया गया। तीन वर्ष बाद इन्हें छोड़ा गया लेकिन पंजाब और सीमा प्रान्त नहीं जाने दिया।

अगस्त 1942 ई. में भारत-छोड़ो आन्दोलन सीमा प्रान्त में अनुशासित ढंग से हुआ। देश के विभाजन से सीमा प्रान्त पाकिस्तान में चला गया, जिससे बादशाह खान बहुत दुखी हुए। पाकिस्तान सरकार ने इन्हें कैद कर लिया। सन् 1964 ई. में पाकिस्तान सरकार ने इलाज के लिए इन्हें लन्दन जाने की अनुमति दी। सन् 1969 ई. में महातमा गांधी की जन्म शताब्दी पर ये भारत आए। अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना के लिए इन्हें नेहरू पुरस्कार दिया गया। श्रीमती इन्दिरा गांधी के निमन्त्रण पर ये सन् 1980 तथा 1981 में भारत आए। सन् 1987 ई. में बादशाह खान को भारत सरकार ने सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ प्रदान किया। 20 फरवरी, 1988 ई. को 98 वर्ष की परिपक्व आयु में इनका निधन हो गया।

डॉ भीमराव अम्बेडकर की जीवनी | B. R. Ambedkar Biography in Hindi

डॉ भीमराव अम्बेडकर का जन्म 14 अप्रैल, 1891 ई. में इन्दौर के महू नामक स्थान पर हुआ। इनके पिता का राम जी फौत में सूबेदार थे। इनकी माता का नाम भीमाबाई सकपाल था। 1907 ई. में मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात् एलफिंगस्टन कॉलेज से इन्होंने इण्टर पास की। 17 वर्ष की आयु में रमाबाई से इनका विवाह हो गया। बड़ौदा नरेश सयाजीराव ने इन्हें छात्रवृत्ति दी। 1912 ई. में इन्होंने बी.ए. पास किया। न्यूयार्क विश्वविद्यालय से 1915 ई. में एम.ए. की डिग्री प्राप्त की। कोलम्बिया विश्वविद्यालय ने इन्हें डॉ. आॅफ फिलॉसफी की उपाधि दी। अर्थशास्त्र व राजनीति के अध्ययन के लिए ये लन्दन गए परन्तु सयाजीराव ने छात्रवृत्ति बन्द कर दी। ये विवश होकर स्वेदश लौटे।

31 जनवरी, 1920 ई. को इन्होंने ‘मूकनायक’ अखबार निकाला। इसका उद्देश्य जातिप्रथा की समापित तथा अस्पृश्यता का निवारण करना था। 21 मार्च, 1920 ई. में इन्होंने कोल्हापुर दलित सम्मेलन की अध्यक्षता की। कोल्हापुर नरेश ने इन्हें दलितों का उद्धारक कहा। सन् 1920 ई. में इन्होंने पुन: लन्दन जाकर वकालत पास की। 27 मई, 1935 ई. को इनकी पत्नी रमाबाई का निधन हो गया।

सन् 1936 ई. में इन्होंने ‘इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी’ राजनैतिक दल का गठन किया। 1937 ई. प्रान्तीय चुनाव में ये भारी बहुमत से विजयी हुए। जुलाई 1941 ई. में इन्हें गणित रक्षा सलाहकार समिति का सदस्य चुना गया। सन् 1945 ई. में इन्होंने पीपुल्स एजुकेशन सोसायटी की स्थापना की। मार्च 1952 ई.में इन्हें राज्यसभा के लिए चुना गया और ये भारत सरकार के कानून मंत्री बने। 14 अक्टूबर, 1956 ई. को इन्होंने बौद्धधर्म ग्रहण कर लिया। 6 दिसम्बर 1956 ई. को इन्होंने बौद्धधर्म ग्रहण कर लिया। 6 दिसम्बर 1956 ई. को इनका देहान्त हो गया। भारत सरकार ने मरणोपरान्त उन्हें ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया।

डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने अनेक उल्लेखनीय कार्य किए। सन् 1924 ई में उनहोंने बहिष्कृत हितकारिणी सभा की स्थापना की जिसका उद्देश्य छुआछूत दूर करना था। इन्होंने सरकार द्वारा दलितों की सेना में भर्ती पर रोक को लेकर 20 मार्च, 1927 ई. का महाड़ में दलित सम्मेलन बुलाया। दलितों के हित के लिए लेजिस्लेटिव काउंसिल के लिए इन्हें सन् 1929 ई. में मनोनीत किया गया।

इन्होंने शिक्षा, मद्यनिषेध, कर व्यवस्था, महिला और बाल कल्याण विषयों पर कड़ा रुख अपनाया। इन्होंने प्रथम, द्वितीय व तृतीय गोलमेज सम्मेलन में दलितों का प्रतिनिधित्व किया। दलितों के उत्थान के लिए गांधी जी के साथ पूना पैक्ट किया। इनकी प्रमुख रचनाएँ द बुद्ध एण्ड हिज गोस्पेज, थाट्स आॅन पाकिसतान, रिवोल्यूशन्स एण्ड काउण्टर रिवोल्यूशन्स इन इण्डिया है।

मौलाना अबुल कलाम आजाद की जीवनी | Abul Kalam Azad Biography in Hindi

मौलाना अबुल कलाम आजाद का जन्म 11 नवम्बर, 1888 ई. को मक्का नगर में हुआ। इसके पिता खैरुद्दीन अरबी के विद्वान थे। माता मदीना के मुफ्ती की पुत्री थी। सन् 1907 में मौलाना का परिवार कोलकाता आ गया। ये कुशाग्र बुद्धि के थे। इन्होंने साहित्य, गणित और दर्शन का गहन अध्ययन किया। इन्हें शायरी और गद्य लेखन का शौक था। 12 वर्ष की उम्र में इन्होंने ‘नैरंगे आलम’ पहली पत्रिका निकाली। इसके बाद ‘लिसानुल सिदक’दूसरा पत्र प्रकाशित किया। इस्लाम के लाहौर अधिवेशन में 15-16 वर्ष के मौलाना ने सधी और संयत भाषा में करीब ढाई घण्टे तक भाषण दिया। इसके बाद इन्होंने कई पत्रिकाओं का सम्पान किया।

सन् 1912 ई. मे इन्होंने अपना प्रसिद्ध साप्ताहिक अखबार ‘अलहिलाल’ निकाला, जिसने लोगों में जागृति की लहर पैदा कर दी। सरकार के खिलाफ लिखने के जुर्म में राँची (झारखण्ड) में चार वर्ष तक इन्हें कैद में रहना पड़ा।

सन् 1920 ई में ये महात्मा गांधी के सम्पर्क में आए। राष्ट्रीय गतिविधियों में सक्रिय होने के कारण इन्हें कई बार जेल जाना पड़ा। इन्होंने गांधी जी के असहयोग को पूरा सहयोग दियां इन्होंने हिन्दू एकता, शान्ति, अनुशासन और बलिदान के लिए देशवासियों को आमन्त्रित किया। सन् 1923 ई. में इन्हें कांग्रेस के विशेष अधिवेशन का अध्यक्ष चुना गया। वे फिर 1940 ई. में कॉग्रेंस के अध्यक्ष बने और स्वन्त्रता प्राप्ति के दौर में अँग्रेजों से हुई विभिन्न वार्ताओं में शामिल हुए।

अगसत 1947 को भारत के स्वतन्त्र होने पर इन्हें शिक्षामंत्री बनाया गया। मौलाना ने शिक्षा, कला, संगीत और साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य​ किए। उन्होने प्रौढ़ शिक्षा और महिला शिक्षा पर अत्यधिक बल दिया। राष्ट्रीय एकता, धार्मिक सहिष्णुता और देशप्रेम का आदर्श प्रस्तुत करके यह यशवस्वी और साहसीख् साहित्यकार, पत्रकार और उच्च्कोटि का राजनेता 22 फरवरी, 1958 ई. को स्वर्ग सिधार गया।

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जीवन परिचय | Sarvepalli Radhakrishnan Biography in Hindi

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्म 5 सितम्बर, 1888 ई. को तमिलनाडु के तिरुपति गाँव में हुआ था। यह दिन प्रतिवर्ष शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है। इनके पिता का नात सर्वपल्ली वीरास्वामी और माता का नाम सीतम्मा था। इन्होंने मद्रास क्रिश्चियन कालेज से एम.ए. किया। 17 वर्ष की आयु में इनका विवाह शिवकमुअम्मा से हुआ। सन् 1909 ई. में मद्रास प्रेसीडेंसी कालेज में उन्होंने शिक्षक जीवन की शुरूआत की। इसके बाद अध्यापन कार्य करते हुए ये कई विश्वविद्यालयों के कुलपति, रूस मे भारत के राजदूत, 10 वर्ष तक भारत के उपराष्ट्रपति और अन्त में 1962 से 1967 तक भारत के राष्ट्रपति रहे। इस प्रकार इन्होंने देश की अनेक सेवाएँ की परन्तु सर्वोपरि ने एक शिक्षक के रूप में रहे। इनके द्वारा लिखी गई प्रमुख पुस्तके हैं – द एथिक्स आॅफ वेदान्त, द फिलॉसफी आॅफ रवीन्द्र नाथ टैगोर, माई सर्च फॉर ट्रुथ, दर रेन आॅफ कंटम्परेरी फिलॉसफी, रिलीजन एण्ड सोसायटी, इण्डियन फिलॉसफी, द एसेंसियल आॅफ सायकॉलजी आदि।

काशी विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों के भारत छोड़ों आन्दोलन में हिस्सा लेने से गवर्नर ने इसे अस्पताल बना देने की धमकी दी थी। राधाकृष्णन ने दिल्ली जाकर वायसराय को प्रभावित कर समस्या हल की। गवर्नर द्वारा आर्थिक सहायता रोकने पर उन्होंने धन जुटाकर विश्वविद्यालय चलाया। शिक्षा के क्षेत्र में विशेष योगदान के लिए 11954 ई. में इन्हें ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया। सन् 1949 ई. में इन्हें मास्कों में भारत का राजदूत चुना गया। मास्कों में भारत की प्रतिष्ठा इन्ही की देन है।

1955 ई. में भारत के उपराष्ट्रपति के रूप में सदन की कार्यवाही का इन्होंने नया आयाम प्रस्तुत किया। सन् 1962 ई. में भारत के दूसरे राष्ट्रपति के रूप में सेवा की। इन्होंने बताया कि आज हमें अमेरिकी या रूसी तरीके की नहीं वरन् मानववादी तरीके की जरूरत हे। 1969 ई. में राष्ट्रपति पद से मुक्त होने पद देशवासियों को सुझाव दिया कि हिंसपूर्ण अव्यवस्था के बिना भी परिवर्तन लाया जात सकता है।

डॉ. राधाकृष्णन पटुवक्ता थे। इनके व्याख्यानों से पूर्ण दुनिया के लोग प्रभावित थे। ये राष्ट्रपति पद से मुक्त होकर मई 1967 ई. चेन्नई (मद्रास) स्थित घर के माहौल में चले गए और अन्तिम आठ वर्ष व्यतीत किए। डॉ. राधाकृष्णन 27 अप्रैल, 1975 ई. को स्वर्गवसी हो गए।

सरोजिनी नायडू की जीवनी | Sarojini Naidu Biography in Hindi

सरोजिनी नायडू का जन्म 13 फरवरी, 1879 ई. को हैदराबाद में हुआ। उनके पिता का नाम अघोरनाथ चट्टोपाध्याय और माता वरदा सुन्दरी थी। सरोजिनी को उनसे कविता लेखन की प्रेरणा मिली। 12 वर्ष की उम्र में मैट्रिक की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास करके उन्हें शिक्षा के लिए इंग्लैण्ड भेजा गया। वहाँ पर सरोजिनी के तीन कवाित संग्रह प्रकाशित हुए ‘ द गोल्डेन थ्रेश होल्ड’, ‘द ब्रोकेन विंग’ और ‘द सेप्टर्ड फ्लूट’। इंग्लैण्ड से वापस आने पर सरोजिनी का विवाह गोन्दिराजुल नायडू से हो गया। सरोजिनी नायडू की भेंट गांधी जी से हुई। वह गोपाल कृष्ण गोखले के कार्य से प्रभावित होकर कांग्रेस की प्रवक्ता बन गई। उन्होंने देशभर में घूमकर स्वतन्त्रता का संदेश फैलाया। सरोजिनी नायडू ने हिन्दू-मुस्लिम एकता पर जोर दिया। उन्होंने इंग्लैण्उ अमेरिका आदि देशों का दौरा किया। गांधी ज की दाण्डी यात्रा में वे उनके साथ थीं। उनके भाषण स्वतन्त्रता की चेतना जगाने में जाद का काम करते थे। 1942 ई. में भारत छोड़ो आन्दोलन में उन्होंने भाग लिया। वे कई बार जोल गई। भारत के स्वतन्त्र होने पर वे उत्तर प्रदेश की राज्यपाल बनीं।

सरोजिनी ने नारी मुक्ति और नारी-शिक्षा आन्दोलन शुरू किया। नारी-विकास  को ध्यान में रखकर ही वे अखिल भारतीय महिला परिषद् की सदस्य बनीं। विजय लक्ष्मी पण्डित, कमलादेवी चट्टोपाध्याय, लक्ष्मी मेननी, हंसाबेन मेहता आदि महिलाएँ इस संस्था से जुड़ी थीं।

सरोजिनी नायडू का व्यवहार बहुत सामान्य था। वे युवा वर्ग की सुविधाओं का बहुत ध्यान रखती थीं। वाणी और व्यवहार में सरोजिनी बहुत ही स्नेमयी थीं। प्रकृति से उन्हें विशेष प्रेम था। 2 मार्च सन 1949 ई. को भारत—कोकिला सदा के लिए मौन हो गई। पं. जवाहर लाल नेहरू ने इन शब्दों में सरोजिनी को श्रद्धांजलि दी, ‘उनकी पूरी जिन्दगी एक कविता, एक गीत थी, सुन्दर, मधुर और कल्याणकारी।’