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रक्षाबंधन पर हिंदी निबंध | Essay on Rakhsha Bandhan

रूपरेखा-प्रस्तावना, हिन्दुओं के प्रमुख त्योहारों में रक्षाबंधन का महत्व, रक्षाबंधन को मनाने की विधि, त्योहार से सम्बन्धित कहानी और घटनाओं का वर्णन, उपसंहार।

हिन्दुओं के चार प्रमुख त्योहार हैं-दशहरा, दीपावली, रक्षाबंधन और होली। इनमें रक्षाबंधन भाई और बहन के असीन स्नेह को प्रकट करने वाला त्योहार है। यह प्राचीनकाल से भारतवर्ष में मनाया जाता है। इस त्योहार को ‘सलूनो’ भी कहा जाता है। रक्षाबंधन के दिन बहने भाइयों के हाथों पर रखी बाँधती हैं। पुराने समय में चावल की पोटली को लाल कलावे में बाँधकर राखी बनाई जाती थीं। किन्तु आजकल तो बाजारों में बड़ी सुन्दर राखियाँ बिकती हैं। राखी के त्योहार से कई दिन पहिले से ही राखियों की बिक्री आरम्भ हो जाती है। राखी बेचने वालों की दुकानें रंग-बिरंगी राखियों से जगमगा उठती हैं और वहाँ ग्राहकों की भीड़ दिखाई देने लगती है। इस दिन घरों में मीठे जवे, सेवई तथा खीर आदि बनाई जाती है। दीवारों पर चित्र बनाए जाते हैं और पूजा होती है। पूजा के बाद हने भाइयों की कलाई पर राखी बाँधती हैं। यह राखी उनके अटूट बंधन को प्रकट करती हैं। भाई अपनी बहन को रक्षा का वचन देते हैं और बहन को रुपये आदि देकर प्रसन्न करते हैं। इसी दिन ब्राह्मण भी व्यक्तियों की कलाई पर राखी बाँधकर उनके सुख की कामना करते हैं तथा दक्षिणा पाते हैं।

प्राचीनकाल से इस त्योहार के बारे में अनेक कथाएँ प्रचलित हैं। इनमें से एक कहानी तो बहुत प्रसिद्ध हैं- कहते है कि एक बार देवताओं और राक्षसों में भयंकर युद्ध छिड़ गया। धीरे-धीरे देवताओं का बल घटने लगा और ऐसा लगने लगा, जैसे देवता हार जाएँगे। देवताओं के राजा इंद्र को इससे बड़ी चिंता हुई। इन्द्र के गुरु ने विजय के लिए श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन इन्द्र के हाथ पर रक्षा-कवच बाँधा और इसके प्रभाव से राक्षस हार गए। कहा जाता है कि तभी से रक्षाबंधन का यह त्योहार आज तक मनाया जाता है। भारतीय इतिहास में भी राखी से सम्बन्धित एक कथा प्रचलित है। एक बार चित्तौड़ की रक्षा के लिए भी बुलाया। हुमायूँ उस समय एक युद्ध में फँसा हआ था। किन्तु वह राखी के महत्व को भली प्रकार समझता था। इसलिए वह तुरन्त चित्तौड़ की रक्षा के लिए चल पड़ा। इस प्रकार राखी बहन और भाई के पवित्र प्रेम को प्रकट करती है। सूत के इन धागों में बहन और भाई के सम्बन्ध को अधिकाधिक दृढ़ बनाने की शक्ति होती है। रक्षाबंधन हमारा पवित्र और महत्वपूर्ण त्योहार है। हमें धन और लेन-देन के लोभ को त्यागकर इसकी पवित्रता का आदर करना चाहिए। वास्तव में यह त्योहार सभी को स्नेह और कर्तव्यपालन का संदेश प्रदान करता है। वास्तव में हमारे प्राचीन ऋषियों ने त्योहारों की जो योजना प्राचीन युग में बनाई थी, उसका महत्व आज भी ज्यों का त्यों बना है। हमें अपने इस त्योहार के प्राचीन गौरव को सदैव ही स्मरण रखना चाहिए तथा इसे बड़े ही उल्लास और पवित्र भाव से मनाना चाहिए।

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विज्ञान के चमत्कार पर निबंध | Wonder of Science Essay

रूपरेखा- वर्तमान युग तथा विज्ञान, इस युग को विज्ञान की देन, विज्ञान के चमत्कारों का वर्णन-(1) मोटर, रेल, वायुयान अादि। (2) टेलीफोन, रेडियो, समाचार-पत्र, बेतार का का तार आदि। (3) चलचित्र ग्रामोफोन, टेलीविजन आदि। (4) बन्दूक, तोप, बम, लड़ाकू विमान, दूरमारक अस्त्र-शस्त्र आदि। (5) विद्युत, नए वस्त्र, अच्छी खाद, उत्तम दवाइयाँ आदि। विज्ञान के चमत्कारों का उपयोग तथा दुरुपयोग, उपसंहार।

वर्तमान युग को वैज्ञानिक युग कहा जाता है। आज हमारे सारे जीवन पर विज्ञान का प्रभाव दिखाई पड़ता है। यदि विज्ञान की देन को आज हमसे छीन लिया जाए तो हम सभी कठिनाइयों में फँस जाएँगे। विज्ञान ने आज हमको जो सुख-सुविधाएँ प्रदान की हैं, वे सब विज्ञान के चमत्कार कहलाते हैं। हमारे शरीर के सुकोमल वस्त्र, घड़ी, ट्रांजिस्टर, पेन आदि सभी विज्ञान की देन हैं। वायुयान, एटम बम, इंजेक्शन, ट्रेन, रेडियो, चलचित्र, टेलीविजन तथा एक्सरे आदि सभी विज्ञान ने ही दिए हैं। विज्ञान के चमत्कारों ने आने-जाने के साधनों में बहुत बड़ा परिवर्तन कर दिया है। प्राचीन काल में मनुष्य अपने घर से दस-बीस मील तक जाने में भी घबराता था किन्तु आज तो वह पृथ्वी का चक्कर लगाने में भी नहीं घबराता। हजारों व्यक्ति विश्व का चक्कर लगा चुके हैं और अब मानव मंगल ग्रह पर जाने की तैयारी कर रहा है। यह सब विज्ञान के ही कारण सम्भव हो सका है। आज जन-साधारण की सेवा के लिए साइकिल, मोटर साईकिल, मोटर कार, ट्रेन, वायुयान आदि हर समय तैयार रहते हैं। आजकल समाचार भेजने में भी विज्ञान मानव की बड़ी सहायता कर रहा है। टेलीफोन, बेतार का तार, समाचार-पत्र और रेडियो ये सब विज्ञान ने ही दिए हैं। आज कुछ ही सेकेंडों मेंएक समाचार सारे संसार में फैल सकता है। हजारों मील बैठा हुआ एक व्यक्त दूसरे व्यक्ति से इस प्रकार बातचीत कर सकता है मानो वह उसके सामने ही बैठा हो। ये सब कुछ सुविधाएँ विज्ञान ने ही तो दी है। विज्ञान में मन बहलाने के लिए चलचित्र, रेडियो, ग्रामोफोन और टेलीविजन आदि भी प्रदान किए हैं। अपने काम से थककर कोई रेडियो सुनता है तो कोई चलचित्र देखने चला जाता है। बन्दूक, तोप, एटम बम, लड़ाकू विमान तथा दूरमारक शस्त्र विज्ञान के अद्भुत चमत्कार है। आज एक देश को मिनट में नष्ट किया जा सकता है। आज संसार का बड़े से बड़ा देश भी विज्ञान के इन विनाशकारी चमत्कारों से काँपता है। आज विज्ञान के बल से एक सैनिक पूरी सेना का नाश कर सकता है। वास्तव में आज हमारा जीवन विज्ञान के सहारे व्यतीत हो रहा है।

विद्युत तो विज्ञान का महान चमत्कार है। इससेे आज हमें प्रकाश मिलता है, मशीनें चलती है, पंखे चलते हैं, गेहूँ पिसता है तथा खाना तैयार होता है। हमारे दैनिक जीवन में काम आने वाली सभी वस्तुएँ विज्ञान ने दी हैं। हमारे शरीर के लिए उत्तम वस्त्र, पढ़ने को उत्तम पुस्तकें, खेतों को अच्छी खाद, रोगों के लिए उत्तम दवाइयाँ, फोटो खींचने के लिए कैमरा और लिखने के लिए कागज विज्ञान ने ही दिए हैं। आज विज्ञान के चमत्कारों के कारण चेचक, हैजा, पोलिया तथा मलेरिया आदि घातक बीमारियों पर पूरी तरह विजय प्राप्त कर ली गई है। वास्तव में विज्ञान के ये चमत्कार समाज के लिए वरदान ही हैं। मनुष्य प्रत्येक वस्तु को अपने मनमाने ढंग से प्रयोग में लाता है। ब्लेड से साफ हजामत भी बनती है और जेब भी काटी जा सकती है। विज्ञान के इन चमत्कारों का मानव ने अनेक स्थानों पर दुरुपयोग भी किया है। महाविनाशक अणु-शक्ति का मानव-कल्याण के लिए भी उपयोग किया जा सकता है। अत: हमारे वैज्ञानिकों को चाहिए कि वे इन चमत्कारों का प्रयोग केवल मानव-कल्याण के लिए ही करें।

संक्षेप में हम कह सकते हैं कि विज्ञान के चमत्कारों ने मानव जाति को बहुत सुख-सुविधाएँ प्रदान की हैं। आज भी समझदार लोग इस बात के लिए प्रयत्न कर रहे हैं कि विज्ञान के ये चमत्कार मानव की सेवा करते रहें, उसे हानि न पहुँचाने पाएँ। आशा है कि मानव इनसे पूरा लाभ उठाता रहेगा तथा जीवन और अधिक सुखमय हो जाएगा।

विद्यार्थी जीवन पर निबंध | Essay on Student Life

रूपरेखा-विद्यार्थी जीवन का महत्व, विद्यार्थी जीवन का मुख्य उद्देश्य-विद्याध्ययन और स्वास्थ्य निर्माण, विद्यार्थी जीवन के सुख और कष्ट, आज के विद्यार्थी की कुछ कमियाँ, सुझाव, उपसंहार।

भारतवर्ष में मानव-जीवन को चार भागों में बाँटा गया है-1. ब्रह्मचर्य, 2. गृहस्थ, 3. वानप्रस्थ और 4. संन्यास। इनमें 5 वर्ष से 25 वर्ष तक की आयु का समय ब्रह्मचर्य कहलाता है। यह काल विद्या अध्ययन का काल होता है। इस काल में जो जितना परिश्रम कर लेता है, उसका जीवन आगे चलकर उतना ही सुखी रहता है। अत: मानव जीवन में विद्यार्थी जीवन का बहुत महत्व है। विद्यार्थी को अपने जीवन का मुख्य उद्देश्य विद्या अध्ययन बनाना चाहिए। जो विद्यार्थी पढ़ने के स्थान पर इधर-उधर घूमते हैं, वे जीवन मे दुख उठाते हैं। उन्हें सब बातों को छोड़कर केवल पढ़ने में मन लगाना चाहिए। प्रत्येक विद्यार्थी को अपने स्वास्थ्य का भी पूरा-पूरा ध्यान रखना चाहिए। यदि इस आयु में स्वास्थ्य बिगड़ जाता है तो फिर जीवनभर पछताना पड़ता है। उसे बुरी आदतें नहीं अपनानी चाहिए। इस प्रकार जो विद्यार्थी चरित्र-निर्माण, अध्ययन और शारीरिक स्वास्थ्य को अपना उद्देश्य बना लेते हैं, वे जीवन में सफलता प्राप्त कर लेते हैं। विद्यार्थी जीवन मानव-जीवन का स्वर्णकाल माना जाता है। इस काल में उसे न कमाने की चिन्ता होती है और न घर-गृहस्थी की। उसके माता-पिता उसकी प्रत्येक बात को पूरा करने को तैयार रहते हैं। उसे अच्छे से अच्छा भोजन और वस्त्र दिए जाते हैं। जितना आनन्द व्यक्ति को विद्यार्थी जीवन में मिल जाता है, उतना फिर आगे कभी नहीं मिल पाता।

भारत सरकार भी विद्यार्थी की उन्नति के लिए निरन्तर प्रयत्नशील है। विद्यार्थियों के भविष्य को अधिक उज्जवल बनाने के उद्देश्य से वर्ष 1985 में राजीव गांधी ने नई शिक्षा नीति की घोषणा की जिससे भारतीय विद्यार्थियों के उज्जवल भविष्य का निर्माण हो सकेगा। विद्यार्थी जीवन में अनेक कष्ट भी होते हैं। जो विद्यार्थी समझदार है वे अपना समय सैर-सपाटों या खेल-तमाशों में बरबाद नहीं करते हैं, अपितु वे रात-दिन पढ़ने में ही लगे रहते हैं। जाड़ों की ठंडी रातों में जब सारा घर आराम से सोता है तो उसे पढ़ना पड़ता है। वह रात को देर से सोता है और प्रात: जल्दी उठ जाता है। पढ़ने की चिन्ता में उसे खाना-पीना कुछ भी अच्छा नहीं लगता। परीक्षा के दिनों में तो छात्रों को घोर परिश्रम करना पड़ता है। इस प्रकार विद्यार्थी जीवन बड़ा ही कष्टमय है।

अधिकांश विद्यार्थी अपने जीवन के उद्देश्य को भूल चुके हैं, वे सैर-सपाटे, फैशन और सिनेमा देखने में ही समय नष्ट कर देते हैं। आज का विद्यार्थी विद्यालय से भागने की कोशिश करता है, वह पढ़ाई को तो बिल्कुल छोड़ देता है और किसी न किसी तरह परीक्षा पास करने की युक्ति सोचता रहता है। आज विद्यार्थी अनुशासन में रहना पसन्द नही करता। इन सब बातों के कारण ही आज का विद्यार्थी उन्नति नहीं कर रहा है। आज छात्रों को विद्याध्ययन का महत्व समझाना आवश्यक है। विद्यार्थी के माता-पिता को भी उनकी चाल-ढाल पर हर समय दृष्टि रखनी चाहिए, उनको अध्यापकों से मिलते रहना चाहिए। दूसरी ओर विद्यार्थी को ऐसी शिक्षा देनी चाहिए जो उसके जीवन को सफल बना सके। वास्तव में आज के छात्र ही कल के नागरिक है। उनकी उन्नति पर ही राष्ट्र की उन्नति आधारित है।

गणतंत्र दिवस पर निबंध – Republic Day Essay in Hindi

रूपरेखा-स्वतंत्रता का महत्व, 26 जनवरी का महत्व, गणतंत्र दिवस के समारोंहों का वर्णन छात्रों, सैनिकों व पुलिस के सम्मिलित जूलूसों का वर्णन, संध्या समय की सभा का वर्णन, रात्रि को घरों व बाजारों में हुए प्रकाश का वर्णन, उपसंहार।

26 जनवरी हमारे देश का एक राष्ट्रीय पर्व है। इसी दिन सबसे पहले वर्ष 1929 को भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस की महासभा ने लाहौर में रावी नदी के तट पर पूर्ण स्वराज्य प्राप्त करने की घोषणा की थी। तब ये निरन्तर देश के सपूत स्वराज्य प्राप्त करने के लिए सचेष्ट रहे तथा 26 जनवरी को एक पवित्र पर्व के रूप में मनाते रहे। महान त्याग और बलिदानों के बाद 15 अगस्त 1947 को भारत देश स्वतंत्र हुआ तथा देश के नेताओं ने अपने देश के लिए अपने संविधान का निर्माण किया। यह संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ और उसी दिन भारत देश एक प्रभुता सम्पन्न गणराज्य घोषित हुआ। इसीलिए 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के रूप में मनाते हैं। गणतंत्र दिवस सारे भारतवर्ष में बड़ी धूम-धाम से मनाया जाता है। यह हमारा एक राष्ट्रीय पर्व है तथा इस दिन सभी कार्यालय तथा विद्यालय आदि बन्द रहते हैं, जिससे सभी लोग गणतंत्र दिवस को धूम-धाम से मना सकें।

अन्य वर्षों की भाँति इस वर्ष भी यह पर्व हमारे नगर में बड़ी धूम-धाम से मनाया गया। प्रात:काल प्रभात फेरियाँ निकाली गई- ‘उठ जाग मुसाफिर भोर’ के मधुर गान से नगर गूँज उठा। चारों ओर ‘भारत माता की जय’ के नारे सुनाई दे रहे थे। प्रात: आठ बजे नगर के अनेक स्थानों पर झंडा फहराया गया। हमारे विद्यालय में ठीक 8 बजे झंडा फहराया गया था। विद्यार्थियों और अध्यापकों ने भाषण दिए और कविताएँ सुनाईं। इस दिन पढ़ाई नहीं हुई। भाषणों के बाद मिठाई बाँटी गई और खेल के मैदान में खेल-कूद शुरु हो गए। विद्यालय में लगभग दो बजे तक यह कार्यक्रम चलता रहा। दोपहर बाद नगर में एक विशाल जुलूस निकाला गया। इस जुलूस में नगर के चुने हुए पुलिस जवान, होमगार्ड और एन.सी.सी. के छात्र सैनिक शामिल हुए। बाजे की धुन के साथ कदम से कदम मिलाता हुआ यह जुलूस शहर के मुख्य बाजारों से होकर निकला। जिस सड़क से होकर यह जुलूस जाता था, उसी सड़क पर नर-नारी उसका स्वागत करते थे। सारे नगर से प्रसन्नता छा गई थी। सभी को स्वराज्य का सुख मिल रहा था। शाम के समय साहित्य परिषद् के मैदान में एक विशाल सभा हुई। इस सभा में सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी आयोजन किया गया था। हमारे विद्यालय के छात्रों ने एक समूहगान प्रस्तुत किया। कन्या पाठशाला की छात्राओं ने एक लोकनृत्य प्रस्तुत किया। नगर के प्रमुख समाज-सेवी और कार्यकताओं ने स्वतन्त्रता पर बलिदान हो जाने वालों के प्रति अपनी भावपूर्ण श्रद्धांजलियाँ अर्पित कीं। रात्रि को नगर में अनेक स्थानों पर प्रकाश किया गया। विद्यालयों में कवि-सम्मेलनों का आयोजन किया गया। इस प्रकार 26 जनवरी का पूरा दिन बड़ी प्रसन्नता के साथ व्यतीत हुआ। वास्तव में गणतंत्र दिवस एक ओर तो हमें देश पर बलिदान हुए युवकों की याद दिलाता है तथा दूसरी ओर मेल से रहने की शिक्षा देता है। हमें एकता, प्रेम और पारस्परिक सहयोग के साथ शान्तिपूर्ण जीवन व्यतीत करना चाहिए, तभी हमारी स्वतन्त्रता दृढ़ रह सकती है। हमें इस दिन अपने देश की उन्नति और विकास में सहयोग देने के लिए शपथ लेनी चाहिए। यही गणतंत्र दिवस को मनाने का उचित ढंग हो सकता है।

भारतीय किसान पर निबंध | Indian Farmer Essay in Hindi

रूपरेखा-1. जन-जीवन के लिए कृषि और उसका महत्व।
2. भारतीय कृषक के सुख और दु:ख का वर्णन-
(क) स्वतन्त्रता से पूर्व सुख और दु:ख।
(ख) स्वतन्त्र भारत में किसान की स्थिति एवं अवस्था।
3. वर्तमान समय में कृषक की समस्याएँ।
4. समस्याओं को हल करने के उपाय।
5. सरकार के प्रयास।
6. कृषक के प्रति हमारा कर्तव्य।

हमारे दैनिक जीवन में काम आने वाली वस्तुओं का मूलाधार कृषि ही है। हमारा भोजन, वस्त्र तथा फल-फूल आदि हमें सभी कुछ कृषि से ही प्राप्त होता है। हमारे देश की जनसंख्या का 70% भाग कृषि-कार्य करके अपनी आजीविका कमाता है। कृषि-कार्य में जुटे हुए ये लोग ही किसान कहलाते हैं। ये भारतीय सभ्यता, संस्कृति और आचार-विचार के प्रतीक होते हैं। इन्हीं के बल तथा सेवा कार्य पर समाज का ढाँचा खड़ा रहता है। शहर की चमक-दमक, नारियों के फैशन तथा नेताओं के सैर-सपाटे सबके सब किसानों के कन्धों पर ही टिके हैं। यह सबका अन्नदाता, वस्त्रदाता और जीवनदाता है। सारा समाज उसी के बल पर पनपता है। अत: जन-जीवन के लिए उसका विशेष महत्व है। किसान का जीवन सादा और सरल होता है। वास्तव में भारतीय किसान ‘सादा जीवन उच्च विचार’का प्रतीक होता है। उसका प्रकृति से सीधा सम्बन्ध होता है। छल-कपट, ईर्ष्या और द्वेष तो वह जानता ही नहीं। यदि उसके खेत से कोई कुछ ले भी जाता है तो वह इसकी कोई चिन्ता नहीं करता और न बदले की भावना रखता है। इस प्रकार भारतीय किसान का जीवन सादा, सरल और स्वास्थ्य से पूर्ण होता है। कृषक जीवन में जहाँ कुछ सुख हैं, वहाँ अनेक दु:ख भी हैंं। अतिवृष्टि, आँधी, जंगल, पशु, चोर और फसल की बीमारी का भय उसे सदैव आतंकित रखता है। घोर गर्मी, शीत और वर्षा में भी वह अपने खेत में काम करता है, तब जाकर कहीं उसकी फसल तैयार होती है और सफल सकुशल घर आ जाए तो यह उसकी सबसे बड़ी विजय होती है।

स्वतन्त्रता प्राप्ति से पूर्व भारतीय किसान की दशा बहुत शोचनीय थी। उसका उचित मान भी न था और उसके परिश्रम का उसे बहुत कम मूल्य मिलता था। साहूकारों और जमींदारों के कारण उसका सारा जीवन ब्याज चुकाते-चुकाते ही बीतता था। पहले जमींदार भी किसानों का खूब शोषण करते थे। इसीलिए भारत सरकार ने सर्वप्रथम जमींदारी और साहूकारी प्रथा को ही समाप्त किया। इसके अतिरिक्त आज भी ग्रामों में सफाई, शिक्षा और मनोरंजन के साधनों का अभाव रहता है। इसीलिए किसानों का सारा सुख, दु:ख में बदल जाता है। वर्षा ऋतु में तो ग्रामों में कीचड़ गन्दगी और मच्छरों का राज हो जाता है। इसससे भी किसान का जीवन दुर्लभ हो जाता है। अच्छे हल, बैल, बीज, खाद, कृषि-यन्त्र तथा उचित सिंचाई के अभाव से उसे अपने परिश्रम का उचित फल नहीं मिलता है, जिससे कि वह सदैव दुखी रहता है। स्वतन्त्र भारत की लोकप्रिय सरकार ने किसानों की दशा को सुधारने के लिए अनेक प्रयास किए हैं। सरकार ने जमींदारी प्रथा को समाप्त कर दिया, चकबन्दी योजना चलाई, पंचायतों को नए अधिकार दिए, ग्रामों में विद्यालय खोले तथा सरकारी समितियों की स्थापना की। इन सुविधाओं के मिलने से भारतीय किसान अब जमींदार, व्यापारी और साहूकार और चंगुल से मुक्त हो गए हैं। आज उसे सरकार की ओर से आर्थिक सहायता भी दी जा रही है, जिससे कि वह अच्छे बीज, खाद और कृषि-यन्त्र खरीद सके। किसान को अन्न का उचित मूल्य दिलाने के उद्देश्य से भारत सरकार प्रत्येक वर्ष गेहूँ का एक न्यूनतम मूल्य निश्चित कर देती है तथा उस मूल्य पर किसान से स्वयं गेहूँ खरीदती है, जिससे किसान को अन्न का उचित मूल्य मिल जाता है और इस प्रकार वह अब थोक व्यापारियों के चंगुल से मुक्त हो गया है। वर्ष 1988 में भारत सरकार ने अपने वार्षिक बजट में कृषि एवं कृषकों को अनेकानेक सुविधाएँ दी हैं। अब इन सुविधाओं के मिलने से किसान के जीवन में पर्याप्त परिवर्तन होजा जा रहा है।

यद्यपि भारतीय किसान साहूकारों, जमींदारों और व्यापारियों से मुक्ति पा चुका है किन्तु प्राय: अब भ्रष्ट सरकारी अधिकारी उसे परेशान करते हैं, आज भी उसकी अशिक्षा, दुर्बलता और पिछड़ेपन का लाभ अधिकारी, क्लर्क और चपरासी तक उठाते हैं। सरकार से मिलने वाली सुविधा का लाभ भी गिने-चुने किसानों को ही मिल पाता है। इसलिए फरवरी 1988 में किसानों ने अपनी माँगों को मनवाने के लिए मेरठ में विशाल प्रदर्शन किया था। आजकल भारत सरकार अपनी पंचवर्षीय योजनाओं पर अरबों रुपये व्यय कर रही है। इन योजनाओं को को कृषि पर केन्द्रीभूत कर दिया है। सरकार ने गन्ने तथा अनाज के मूल्यों को ऊँचा बनाकर किसानों को उसके परिश्रम का उचित मूल्य दिलवाया है। इससे भारतीय किसान का जीवन बदल गया है। आज अधिकतर कच्चे झोंपड़ों के स्थान पर पक्के मकान बनवा चुके हैं। उनके बच्चे नगरों में उच्च शिक्षा प्राप्त करते हैं तथा आधुनिक कृषि-यन्त्रों के प्रयोग से उनकी उपज दिन दुनी रात चौगुनी बढ़ती जा रही है। वास्तव में किसान का जीवन त्याग, तपस्या, सेवा और सरलता का प्रतीक है। उन्होंने देश की खाद्य समस्या को हल करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उनके महत्व को समझकर स्वर्गीय लालबहादुर शास्त्री ने देश को ‘जय जवान जय किसान’ का नारा दिया था। हमें भी किसानों के प्रति सहानुभूति का व्यवहार करना चाहिए तथा उनकी उन्नति के लिए निरन्तर प्रयत्न करते रहना चाहिए। वह सुखी हैं, तो जग सुखी है।

होली पर हिन्दी निबंध | Holi Essay In Hindi

रूपरेखा-हिन्दुओं के चार प्रमुख त्योहार, होली के त्योहार का समय, त्योहार के मनाने का ढंग, होली का महत्व, होली के मनाने में सुधारों की आवश्यकता, हमारा कर्तव्य,उपसंहार।

हिन्दुओं के चार प्रमुख त्योहार माने जाते हैं-दशहरा, होली, दीपावली और रक्षाबन्धन। इसमें होली मस्ती और प्रसन्नता का त्योहार है। यह त्योहार सारे देश में बड़ी धूम-धाम से मनाया जाता है। सभी जातियों के लोग इसे बड़ी प्रसन्नातापूर्वक मनाते हैं। होली का त्योहार फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। पूर्णिमा के दिन किसी बड़े चौक में ईंधन का ढेर लगा दिया जाता है। रात्रि में इसका पूजन होता है और इसमें आग लगा दी जाती है। सभी लोग इस आग में जौ की बालिया भूनते हैं आर एक दूसरे से गले मिलते है। होली जलने के दूसरे दिन होली खेली जाती है। सुब​ह से ही चारों ओर रंग की फुहारें उड़ने लगती है। लाल गुलाल से सबसे मुँह रँग दिए जाते हैं। सुबह से ही चारों ओर व्यक्ति एक-दूसरे पर रंग डालते हैं और प्रेम से एक-दूसरे से गले मिलते हैं। दोपहर को लगभग दो बजे तक यही कार्यक्रम चलता रहता है। इसके बाद लोग नहा-धोकर नए कपड़े पहनकर बाहर निकलते हैं और सारा दिन बड़ी हँसी-खुशी के साथ व्यतीत करते हैं। होली के त्योहार के सम्बन्ध में अनेक कहानियाँ कही जाती है। कुछ लोगो के अनुसार इसी दिन हिरण्य कश्यप की बहन होलिका भक्त प्रह्लाद को लेकर आग में बैठ गई थी, किन्तु भगवान की कृपा से प्रहृलाद बच गया और ​होलिका जल गई। इसी स्मृति में आज भी होली जलाई जाती है। कुछ भी हो, यह त्योहार हँसी-खुशी में भरपूर होता है। होली का त्योहार आज जिस ढंग से मनाया जाता है, उसमें सुधारों की भी आवश्यकता है। हमें होली इस प्रकार खेलनी चाहिए जिससे दूसरों को भी प्रसन्नता हो। किसी को भी दु:ख नहीं होना चाहिए। होली में ईंधन के लिए किसी के भी साथ हठ नहीं करनी चाहिए। बहुत से व्यक्ति रंग के स्थान पर कीचड़ मिट्टी आदि का प्रयोग करते है, इससे हानि होती है, ऐसा कभी नहीं करना चाहिए। अत: इनसे बचना चाहिए तथा अपने इस त्योहार को हँसी-खुशी के साथ मनाना चाहिए। वास्तव में होली के त्योहार का बहुत महत्व है। यह त्योहार एकता और भाई-चारे को बढ़ाने वाला है। अत, हमें इसे इसी रूप में मनाना चाहिए तथा प्रेमपूर्वक एक दूसरे से मिलना चाहिए।

सुश्रुत व चरक – भारत के महान चिकित्सक

आयु सम्बन्धी ज्ञान (वेद) को आयुर्वेद कहते हैं। आयुर्वेद सम्बन्धी सिद्धान्तों का संकलन ऋषियों द्वारा संहिताओं में हुआ है। सुश्रुत संहिता शल्य तंत्र प्रधान तथा चरक संहिता काय चिकित्सा प्रधान ग्रंथ है। इनके लेखक सुश्रुत और चरक हैं।

सुश्रुत – छह सा वर्ष ईसा पूर्व में जन्मे सुश्रुत आज भी ‘प्लास्टिक सर्जरी’ के जनक माने जाते हैं। इन्होंने वैद्यक और शल्य चिकित्सा का ज्ञान वाराणसी में दिवोदास धन्वंतरि के आश्रम में प्राप्त किया। ये मूत्र नलिका से पत्थर निकालने, टूटी हड्डी को जोड़ने और मोतियाबिंद की शल्यचिकित्सा में दक्ष थे। आॅपरेशन से पहले कीटाणु मारने के ​लिए उपकरण गर्म करना और बीमार को नशीला द्रव पिलाना आज भी मान्य है। सुश्रुत ने अपने शिष्यों से कहा कहा था, ”अच्छा वैद्य वही है, जो सिद्धान्त और अभ्यास दोनों में पारंगत हो।” सुश्रुत ने अपनी सुश्रुत संहिता में 101 उपकरणों की सूची दी है। आज भी उनके समान यंत्र वर्तमान चिकित्सक प्रयोग में लाते हैं।

चरक – चरक ने आयुर्वेद चिकित्सा के क्षेत्र में शरीर विज्ञान, निदान शास्त्र और भ्रूण विज्ञान पर चरक संहिता लिखी, जो आज भी चिकित्सा जगत् में सम्मानित है। ये सम्भवत: नागवंश में पैदा हुए और पश्चिमोत्तर प्रदेश क रहने वाले थे। चरक पहले चिकित्सक थे, जिन्होंने पाचन प्रक्रिया और शरीर प्रतिरक्षा की अवधारणा दी। इनके अनुसार शरीर में वात, पित्त और कफ के कारण दोष उत्पन्न हो जाता है। इन्होंने स्पष्ट किया कि एक शरीर दूसरे से भिन्न होता है। शरीर के तीनों दोष असन्तुलित होने से बीमारी पैदा हो जाती है। इन दोषों के सन्तुलन के लिए इन्होंने दवाईयाँ बनाईं।

चरक को शरी में जीवाणुओं की उपस्थिति का ज्ञान था। चरक ने आनुवंशिकी के सम्बन्ध में मान्यता दी कि बच्चों में आनुवंशिक दोष जैसे – अन्धेपन, लँगड़ेपन जैसी विकलांगता माता-पिता की कमी के कारण नहीं, बल्कि डिंबाणु या शुक्राणु की त्राुटि के कारण होती है। यह मान्यता आज भी मान्य है। चरक ने दाँतों सहित शरीर में ती सौ साठ हड्डियों का होना बताया इन्होंने शरीर रचना और भिन्न अंगों का अध्ययन किया और ध​मनियों में विकार आना बीमारी का कारण बताया।