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सुब्रमण्यम भारती की जीवनी | Subramanya Bharathi Biography in Hindi

सुब्रमण्यम का जन्म तमिलनाडु के शिवयेरी ग्राम में सन् 1882 ई. को हुआ। इनके पिता चिन्नास्वामी तमिल भाषा के प्रकांड पंडित थे, जिनका एटअपुरम दरबार में मान था। सुब्रह्राण्यम् बचपन से ही कविता करने लगे थे। ग्यारह वर्ष की अवस्था में इनकी काव्य प्रतिभा देखकर विद्वानों ने इन्हें ‘भारती’ की उपाधि दी। पाँच वर्ष की अवस्था में ही माँ के मरने पर दूसरी माँ ने इन्हें और इनकी बहन भागीरथी को माँ जैसा प्यार दिया। पिता के मरने पर चौदह वर्ष के बालक भारती के लिए परिवार चलाना दुरूह हो गया। निर्धनता की मार्मिक अनुभूति इनकी कविता ‘धन की महिमा’ में व्यक्त हुई।

भारती ने वाराणसी जाकर हिन्दी, संस्कृत का अध्ययन किया। अँग्रेजी की शिक्षा पिता के समय में ही तिरुवेलवेली के अँग्रेजी स्कूल में प्राप्त की। हिन्दी को ये देश की एकता के लिए सक्षम समझते थे। वाराणसी में इन्होंने काशी क्षेत्र तथा वहाँ की संस्कृति का अध्ययन किया। एक वर्ष के बाद ये फिर अपने गाँव में आकर साहित्य साधनारत हो गए। इन्हें स्वच्छन्तावादी कविताएँ पसन्द थीं। शैली के नाम पर इन्होंने अपना उपनाम ‘शैल्लिदासन’ रख लिया था। इन्होंने अँग्रेजी कविताओं का तमिल में अनुवाद किया।

भारती में मानवतावादी दृष्टिकोण प्रबल था। समाज की उन्नति के लिए ये आपसी मेल-जोल जरूरी आन्दोलन के लिए प्रेरित किया। भारती शान्ति एवं अहिंसा के पुजारी थे। अहिंसा से स्वराज्य प्राप्त करना इनका अभीष्ट था। भारती स्वभाव से दानी थे। इनकी दानशीलता की अनेक कथाएँ आज भी तमिलनाडु में प्रचलित हैं। भारती बच्चों से बहुत स्नेह करते थे और कभी-कभी बच्चों जैसा आचरण भी करने लगते थे। पागल हाथी को गन्ना और नारियल खिलाते समय उसके धक्के से ये बेहोश हो गए। अस्पताल में बीमार रहकर 12 दिसम्बर, 1922 ई. को इनका निधन हो गया।

भारती देश की एकता और अखण्डता के पोषक थे ये ऐसी स्वतन्त्रता के पोषक थे, जो एकता और समानता पर टिकी हो। इनकी कृतियों को तमिलनाडु सरकार ने ‘भारती-ग्रन्थावली’ के अन्तर्गत तीन खण्डों में प्रकाशित किया है।

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