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मीराबाई का जीवन परिचय | Mirabai Biography in Hindi

मीराबाई मेवाड़ के रतनसिंह राठौर की एकमात्र कन्या थी। इसका जन्म सन् 1498 ई. में राजस्थान में हुआ। बचपन में ही इनकी माता की मृत्यु हो जाने से इनका लालन-पालन दादा रावदूदा ने किया। रावदूदा वैष्णव भक्त थे। मीरा पर दादा के विचारों और क्रियाओं का प्रभाव होन के कारण ये बचपन से ही श्री कृष्ण की अनन्य भक्त बन गई।

मीरा का विवाह राणा के ज्येष्ठ पुत्र महाराज कुँवर भोजराज से हुआ। सुखी जीवन बिताते हुए ये पति सेवा और उपासना में लगी रहती थीं। दस वर्ष बाद पति की मृत्यु हो जाने पर मीरा श्री कृष्ण की आराधना में लीन हो गई। इनकी भक्ति की चर्चा सुनकर सन्त लोग दर्शन करने आने लगे। भाव-विभोर होकर मीरा संतों के साथ नाचने लगतीं। मीरा की सास, ननद-ऊदा और राणा विक्रम सिंह को मीरा का रहन-सहन बुरा लगता था। उन सबने मीरा को बहुत कष्ट दिया। इससे मीरा का कृष्ण के प्रति लगाव और बढ़ता गया। राणा ने मीरा को मारने के लिए जहर दिया, परन्तु उस पर कुछ प्रभव नहीं पड़ा।

मीराबाई निर्भीक महिला थीं। इन्होंने रूढ़िवादी परम्पराओं को तोड़ा। ये पहले वृन्दावन और बाद में द्वारका चली गई और शेष जीवन भक्तों की तरह बिताने लगीं। द्वारका मे ये प्रतिदिन श्री द्वारकाधीश मन्दिर जाती थीं। द्वारका में रहते हुए ही इनका निधन हुआ। मीराबाई में अपूर्व काव्य क्षमता थी। इन्होंने ब्रजभाषा, राजस्थानी, गुजराती भाषा में अपने भावों को सरल शब्दों में व्यक्त किया है। मीरा के पदों ने जन-जन को प्रभावित किया। इनका सम्बन्ध किसी सम्प्रदाय विशेष से नहीं था। इन्होंने निजी साधना को मान्यता दी। इनकी उपासना माधुर्य भाव की थी और श्री कृष्ण को पति रूप में पूजती थीं। मीराबाई ने उच्चकोटि की भक्ति साधना से अपना, समाज, साहित्य और देश का कल्याण दिया। ये भारतीय नारी समाज का गौरव थीं। इनके पद हिन्दी साहित्य की अमूल्य निधि है।

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