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महावीर स्वामी की जीवनी | Mahavir Swami Story in Hindi

महावीर स्वामी के बचपन का नाम वद्र्धमान था। इनका जन्म 599 ईसा पूर्वमें वैशाली (उत्तरी बिहार) के अन्तर्गत कुन्डग्राम में एक क्षत्रिय परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम सिद्धार्थ तथा माता का नाम त्रिशला देवी था। वद्र्धमान बाल्यकाल से ही बुद्धिमान, सदाचारी ओर विचारशील थे। नाना प्रकार के सांसारिक सुख-साधन होते हुए भी इनकी आत्मा में बेचैनी थी। इसी बीच वद्र्धमान के​ पिता का देहान्त हो गया। इससे वद्र्धमान को अत्यन्त दुख हुआ। सांसारिक मोह, माया को त्याग कर वद्र्धमान ने अपने बड़े भाई ​नन्दिवद्र्धन की आज्ञा लेकर संन्यास ले लिया। ये सत्य और शान्ति की खोज में निकल पड़े। इसके​ लिए इन्होंने तपस्या का मार्ग अपनाया। इनका विचार था कि कठोर तपस्या से ही मन में छिपे काम, क्रोध, लोभ, मद तथा मोह को समाप्त किया जा सकता है। बारह वर्षो की कठिन तपस्या के पश्चात् इन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ। कठोर तपस्या के कष्टों को सफलतापूर्वक झेलने तथा इन्द्रियों को वश में कर लेने के कारण वे ‘महावीर’ कहलाने लगे।

जैनियों की मान्यता के अनुसार जैन धर्म में महावीर से पूर्व तेईस अन्य तीर्थकर हुए हैं। महावीर इस धर्म के अन्तिम तीर्थकर थे। ज्ञान प्राप्ति के पश्चात् महावीर स्वामी तीस वर्ष तक अपने धर्म का प्रचार बहुत उत्साह से करते रहे।

महावीर स्वामी के उपदेशों का जन साधारण पर गहरा प्रभाव पड़ा। इन्होंने एक ऐसा मार्ग दिखाया जिस पर चलकर लोग मोक्ष की प्राप्ति कर सकते हैं। महावीर के अनुसार तीन अत्यन्त महत्वपूर्ण बातें मनुष्य को मोक्ष-मार्ग पर ले जाती हैं। इसी को जैन धर्म में ‘त्रिरत्न’ कहा गया है। ये हैं – सम्यक् दर्शन (सही बात पर विश्वास), सम्यक् ज्ञान (सही बात का ज्ञान) तथा सम्यक् चरित्र (उचित कर्म)। महावीर स्वामी कर्मकाण्ड, यज्ञ और अनुष्ठान पर विश्वास नहीं करते थे। शुद्ध आचरण के लिए इन्होंने ‘पंच महाव्रतों–सत्य, अहिंसा, अस्तेय, ब्रह्रमचर्य और अपरिग्रह का विधान समाज के सम्मुख प्रस्तुत किया।

बहत्तर वर्ष की अवस्था में महावीर स्वामी पाटलिपुत्र (पटना) के निकट पावापुरी नामक स्थान पर बीमार पड़े और यही इन्हें निर्वाण प्राप्त हुआ।

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