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एनी बेसेंट की जीवनी | Annie Besant Biography in Hindi

जिन विदेशी महिलाओं ने भारत के राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक उत्थान में महत्वपूर्ण योगदान किया है, उनमें एनी बेसेन्ट का स्थान बहुत ऊँचा है। इनका जन्म 1 अक्टूबर, 1847 ई. को लन्दन में हुुआ था। एनी बेसेन्ट स्वतन्त्र विचारक तो थीं ही। हिन्दू धर्म के पुनरुथान में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। अपने पादरी पति फ्रैंक बीसेन्ट के सम्पर्क में आजे ही उनके मन में ईसाई धर्म के उपदोशों के विषय में शंकाएँ उत्पन्न होने लगीं। दाम्पत्य जीवन अधिक सुखमय नहीं ​था, फिर भी एनीबेसेन्ट अपने कर्तव्य का पालन करती रही।

छियालिस वर्ष की उम्र में एनी बेसेन्ट भारत आई और फि यही रह गई। उन्होने भारत की समाजिक और धार्मिक स्थिति का गहन अध्ययन किया। उन्होंने अनुभव किया कि भारत के विद्यालयों के पाठ्यक्रम में धार्मिक और नैतिक शिक्षा को भी सम्मिलित करने की आवश्यकता है। वे भारत के विद्यानो, विचाराकों धर्म-गुरुओं और समाज सुधारकों के सम्पर्क में आई तथा उनके साथ विचार-विमर्श किया। अडयार (तमिलनाडु), वाराणसी, मुम्बई, आगरा, लाहौर आदि स्थानों पर जाकर उन्होंने भाषण दिए। शिक्षा के प्रचार-प्रसार और शिक्षा प्रणाली में सुधार पर उनके भाषणों में विशेष बल रहता था। काशी विश्वविद्यालय की स्थापना में उन्होंने मालवीय जी के कन्धे से कन्धा मिलाकर कार्य किया।

एनी बेसेन्ट व्यक्ति की स्वतन्त्रता की हिमायती थीं। उनका कहना था कि व्यक्ति को अपने च्तिन के परिणामों को स्वतन्त्रता से व्यक्ति करने का अधिकार होना चाहिए। उनका विश्वास था कि एक-दूसरे के प्रति सत्य का आचरण करके ही हम स्वतन्त्रता प्राप्त कर सकते हैं। स्वेच्छाचारी और उच्छृंल व्यक्ति अपने को कभी स्वतन्त्र अनुभव नहीं कर सकता। वे कहती थीं किआत्म-संयम की नीवं पर स्वतन्त्रता का भवन खड़ा होता है। वर्ग-भेद, जाति भेद, पारस्परिक कलह और घृणा से छुटकारा पाए बिना कोई राष्ट्र स्वतन्त्र नहीं हो सकता। वे राष्ट्र को भी एक आध्यात्मिक सत्ता मानती थीं और कहती थी राष्ट्र स्वाधीन भावना, एकता की भावना पर आश्रित है। राष्ट्र का लक्ष्य है कि अनी जातीय विशेषताओं के माध्यम से विश्व की सेवा करना। वे भारत को ऐसे ही समृद्ध राष्ट्र के रूप में देखना चाहती थीं। उनके मन में भारत से गहरा लगाव था।

एनी बेसेन्ट भारत के स्वाधीनता आन्दोलन से भी जुड़ा हुई थीं। एनी बेसेन्ट अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त महिला थीं। उनमें सत्य के लिए संघर्ष करनेवाली सशक्त आत्मा विद्यमान थी। जिस समय भारत ने स्वराज के लिए संघर्ष आरम्भ किया, उस समय अनेक ऐसी शक्तियाँ थीं, जो भारत को एक स्वतन्त्र राष्ट्र के रूप में नहीं स्वीकार करना चाहती थीं। एनी बेसेन्ट ने धर्म और आध्यात्म का मार्ग अपना कर भारतीय राष्ट्रवाद की शक्ति बढ़ाई। भूतपूर्व प्रधानमन्त्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने कहा था – ”आज की पीढ़ी के लिए नामपात्र हो सकती हैं, लेकिन मेरी और मुझसे पहली की पीढ़ी के लिए उनका व्यक्तित्व बहुत महान है, जिसने हम लोगों को बहुत प्रभावित किया। इसमें शक नहीं हो सकता कि भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में उनका योगदान बहुत अधिक थ। इसके अतिरिक्त वे उन लोगों में से थीं, जिन्होंने हमारा ध्यान अपनी सांस्कृतिक धरोहर की ओर आकर्षित किया और हममें उसके प्रति गर्व पैदा किया।”

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