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आदि शंकराचार्य की जीवनी | Adi Shankaracharya Biography in Hindi

शंकराचार्य का बचपन का नाम शंकर था। इनका जन्म आठवीं सदी में केरल में पूर्णा नदी के तट पर स्थित कालड़ी ग्राम में हुआ। इनक पिता का नाम ​शिवगुरु व माता आर्यम्बा थी। शंकर के पिता व दादा वेद-शास्त्री के धुरन्धर और भाग्यशाली होगा। तीन वर्ष की उम्र में शंकर के पिता का देहान्त हो ने पर माँ ने अध्ययन के लिए गुरु के पास भेजा। थोड़े ही समय में वेदशास्त्रों और धर्मग्रन्थों में पारंगत होने से इनकी गणना प्रथम कोटि के पण्डितों में होने लगीं।

विद्याध्ययन के बाद शंकर घर लौटे। माँ ने आशीर्वाद लेकर वह संन्यासी बनने नर्मदा के तट पर तपस्या में लीन संन्यासी गोविन्दनाथ के पास पहुँचे। उन्होंने इनका नाम शंकराचार्य रखा। ये गुरु की अनुमति लेकर सत्य की खोज में निकल पड़े। गुरु ने पहली काशी जाने का सुझाव दिया।

काशी में गंगास्नान करने जाते हुए उन्हें एक चाण्डाल मिला। उसकी बातों से इन्हें सत्य का ज्ञान हुआ। इन्होंने काशाी के प्रकाण्ड विद्वान मण्डन मिश्र और उनकी पत्नी भारती को शाास्त्रार्थ में हराकर अपना शिष्य बना लिया। ये बड़े—बड़े विद्वानों को परास्त करने वाले दिग्विजयी पण्डित कुमारिल भट्ट से शास्त्रार्थ करने प्रयागधाम पहुँचे। इसी प्रकार ये अन्य स्थानों पर भी भ्रमण करते रहे। जब ये गंगेरी में थे तो इन्हें माँ की बीमारी का पता चला। ये तत्क्षण अपनी माँ के पास पहुँच गए। माँ इन्हें देखकर खुश हुई। माँ की मृत्यु के बाद लोगों द्वारा विरोध किए जाने के बावजूद इन्होंने माँ का दाह-संस्कार किया।

शंकराचार्य ने धर्म की स्थापना के​ लिए सारे भारत का भ्रमण किया। उन्होंने नए मंदिरों का निर्माण कराया औश्र पुराने मन्दिरों की मरम्मत कराई। लोगों को राष्ट्रीयता के सूत्र में पिरोने के लिए इन्होंने भारत के चारों कोनों पर चार धामों (मठों) की स्थापना की। इनके नाम हैं—श्री बद्रीनाथ, द्वारिकापुरी, जगन्नाथपुरी तथ श्री रामेश्वरम्। ये चारों धाम आज भी मौजूद है। इनकी शिक्षा का सार है—

”ब्रह्म सत्य है तथा जगत् माया है।”

शंकराचार्य उज्जवल चरित्र के सच्चे संन्यासी थे, जिन्होंने अनेक गन्थों की रचना की। 32 वर्ष की आयु में उनका देहावसान हो गया।

उनका अन्तिम उपदेश था, ” हे भगवान तू स्वं को पहचान, स्वंय को पहचानने के बाद तू ईश्वर का पहचान जाएगा।”

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